राज्य की उत्पत्ति और सिद्धांत का वर्णन || Rajya Ki Utpatti

हेलो दोस्तों आपका स्वागत है आप इस आर्टिकल के माध्यम से राज्य की उत्पत्ति (Rajya Ki Utpatti) और सिद्धांत मनु वादी सिद्धांत राज्य व्यवस्था के बारे में आप इस आर्टिकल के माध्यम से पढ़ने वाले हैं। यह बहुत इंटरेस्टिंग जानकारी होने वाली है इसे पूरा पढ़ें, चलिए हम महत्त्वपूर्ण जानकारियों पर फोकस करते हैं।

राज्य की उत्पत्ति (Rajya Ki Utpatti)

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मनुस्मृति में दो प्रकार के विचारों का उल्लेख है। हम उन्हें राज्य की उत्पत्ति के दो सिद्धान्त भी कह सकते हैं। ये दो सिद्धान्त हैं, पहला राज्य की उत्पत्ति का दैवीय सिद्धान्त और दूसरा राज्य की उत्पत्ति का समझौतावादी सिद्धान्त। मनु ने इन दोनों सिद्धान्तों का समन्वय किया है। Rajya Ki Utpatti के दैवीय सिद्धान्त को समझने के पूर्व अति संक्षेप में सृष्टि की रचना के सम्बन्ध में सर्वमान्य हिन्दू सिद्धान्त को समझना आवश्यक है। हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में यह माना गया है कि संसार की उत्पत्ति के पूर्व, चारों ओर जल ही जल था। इसी अवस्था को प्रलयकाल कहा जाता है।

इस अवस्था में चारों ओर अंधकार और अव्यवस्था थी। अंधकार अव्यवस्था दूर करने के लिए परमात्मा का अवतरण हुआ। परमात्मा स्वयंभू हैं, वे अपनी इच्छा से शरीर धारण कर सकते हैं। प्रकट होने के बाद उन्होंने सृष्टि की रचना की इच्छा की। इस हेतु उन्होंने सर्वप्रथम जल की सृष्टि की तथा जल को ही उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया। जल में परमात्मा ने अपने शक्तिरूपी बीज को छोड़ा, इससे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्मा ने समस्त लोक, आकाश,। दिशाओं, सातद्वीपों वाली पृथ्वी आदि की रचना की। फिर अनेक जीवों को उत्पन्न किया। लोक वृद्धि के लिए ब्रह्मा ने आधे शरीर से स्त्री और आधे शरीर से पुरुष रूप धारण किया (अर्धनारीश्वर) जिसके संयोग से मनु, दस प्रजापति और असंख्य नर-नारियों की Utpatti का क्रम प्रारम्भ हुआ।

राज्य की उत्पत्ति के पूर्व प्राकृतिक अवस्था

प्राकृतिक अवस्था और राजा की सृष्टि:-Rajya Ki Utpatti के पूर्व प्राकृतिक अवस्था थी। इस अवस्था में न तो शान्ति थी और न कोई व्यवस्था थी। कोई नियम आदि नहीं थे। चारों ओर संघर्ष था। बलवान कमजोर को दबाता था, मनमानी का साम्राज्य था। कमजोर अपनी बात कहीं कह नहीं सकते थे। ‘मत्स्य न्याय’ चारों ओर था। संक्षेप में हम इस अवस्था की तुलना हॉब्स ने जिस प्राकृतिक अवस्था की चर्चा की है उससे कर सकते हैं। पृथ्वी पर व्याप्त इस अराजक अवस्था को दूर करने के लिए ईश्वर ने राजा की सृष्टि की।

समझौता सिद्धान्त (compromise theory)

मनुस्मृति में राज्य की उत्पत्ति के सिद्धान्तों की विशद् व्याख्या नहीं की गई है, अपितु संक्षेप में उनका उल्लेख मिलता है। मनु ने राज्य की उत्पत्ति के समझौता सिद्धान्त का उल्लेख किया है। समझौता सिद्धान्त भारतीय राजदर्शन का मान्य सिद्धान्त है। वस्तुतः मनु ने राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त और समझौता सिद्धान्त दोनों का समन्वय-सा किया है। यह भी कहा जा सकता है कि मनुस्मृति में Rajya Ki Utpatti बाह्य रूप से भले ही दैवीय सिद्धान्त रहा, पर उसका आन्तरिक रूप समझौता सिद्धान्त ही है।

राज्य की उत्पत्ति (origin of the state) के पूर्व समाज की दशा अत्यन्त भयावह थी। चारों ओर अराजकता, अव्यवस्था और अस्थिरता थी। मानव जीवन अनिश्चित था। इस स्थिति से ऊबकर मानव ने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उनके जीवन की रक्षा करे। तब ईश्वर ने राजा को उत्पन्न किया। मनु ने राजा को देवों का अंश माना। मनु के अनुसार ब्रह्मा ने देवताओं-इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि और कुबेर के गुणों का सार लेकर राजा को उत्पन्न किया। इस रूप में राजा देवताओं का पृथ्वी पर साक्षात् अवतार है।

मनु का कथन है कि ‘Raja चाहे बालक ही क्यों न हो परन्तु उसका कभी अनादर नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह एक देवता है, जो कि मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर विचरता है।’ यहाँ तक तो ठीक है और यह दैवीय सिद्धान्त की ओर संकेत है, पर राजपद ग्रहण करते समय राजा प्रजा के हित में संलग्न रहने की जो शपथ लेता है, वह पूर्णतः समझौते का ही रूप है। मनुस्मृति के अध्याय 7-8-9 में जो वर्णन मिलता है, वह इस तथ्य को उजागर करता है।

मनु कुछ प्रमुख Rajy समझौता सिद्धान्त

1-मनु ने राजा को प्रजा के हित के लिए कार्य करते रहने का आदेश दिया है, Raja अष्टदेवों के सारभूत तत्वों से बना अवश्य है पर वह मनुष्य है तथा धर्म के अधीन है। मनु ने यह भी कहा है कि जो राजा, प्रजा की रक्षा नहीं कर पाता। वह शासक योग्य नहीं है।

2-मनु शासक को अमर्यादित आचरण करने की स्वतन्त्रता नहीं देते। मनु का स्पष्ट मत है कि शास्त्रों की मर्यादा न करने वाले, नास्तिक, उचित-अनुचित का भेद किए बिना दण्ड देने वाले तथा धन लेने वाले राजा को अर्धागति प्राप्त होती है, अर्थात् राजा अनिवार्यतः शास्त्रों एवं औचित्य-अनौचित्य के नियमों में नियंत्रित है।

3-यह ठीक है कि मनु राजा को अष्ट देवों के सारभूत अंग से निर्मित मानते हैं। पर वे स्वयं मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक क्रम 303 से 311 तक कहते हैं कि इन देवताओं की गणना उपमा मूलक है। इसकी व्याख्या यह है कि राजा को सूर्य, इन्द्र, वायु, यम आदि देवताओं के गुण और कर्म से प्रेरणा लेनी चाहिए। जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों द्वारा जल को उड़ाता है तथा इन्द्र वर्षा करता है जिसके कारण अन्न आदि की वृद्धि होती है। उसी प्रकार राजा को सूर्य के समान प्रजा से कर लेकर पुनः इन्द्र के समान प्रजाहित में उसे व्यय कर देना चाहिए। इन उपमाओं का झुकाव समझौते के सिद्धान्त की ओर है।

4-मनु का मत है कि यदि प्रजा राजा से क्रु हो जाय तो उसका परिणाम यह होता है कि उस राजा को स्वर्ग से वंचित होना पड़ता है।

5-मनु व्यवस्था देते हैं कि राजा यदि गलती करता है तो उसे सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक दण्ड भोगना पड़ता है। जिस अपराध के लिए सामान्य व्यक्ति को एक पण का दण्ड दिया जाता है, उसी अपराध के लिए राजा को एक सहस्र पण का दण्ड मिलता है। उपर्युक्त तथ्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मनु ने राजा को निरंकुश, अनुत्तरदायी और स्वेच्छाचारी नहीं माना, उसका प्रथम दायित्व प्रजा के प्रति है। यदि वह प्रजा के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह नहीं करता और वह अधर्म करता है तथा पाप का भागी और नरक का भोग करता है तथा बन्धु-बान्धवों सहित नष्ट हो जाता है। स्पष्टतः उपर्युक्त तथ्य समझौता सिद्धान्त की ओर संकेत करते हैं। डॉ. जायसवाल भी इस मत के हैं कि राजा की उत्पत्ति समझौता सिद्धान्त के द्वारा हुई है।

राजा की स्थिति एवं उसकी योग्यता (Raja Ki Esthiti)

मनु ने राजा को सर्वोच्च स्थान दिया है। आठ लोकपालों के विशिष्ट गुणों से युक्त राजा सर्वोच्च है। राजा धर्म का संस्थापक है, पर वह स्वयं धर्म के ऊपर नहीं। अतः वह धर्म का उल्लंघन नहीं कर सकता। राजा के साथ विश्वासघात अथवा उसके विरोध में आक्रमण आदि करना महान् अपराध है। राज्य की सभी वस्तुओं का कुछ भाग राजा का होता है, कोई भी राज्य बिना राजा के नहीं हो सकता। युद्ध के समय अथवा अन्य किसी अवस्था में यदि राजा की मृत्यु हो जाती है, तो शीघ्र ही दूसरा राजा नियुक्त किया जाना चाहिए।

राजा के उत्तराधिकार घोषित करने की व्यवस्था मनु ने की है, इसलिए राजा के ज्येष्ठ पुत्र को युवराज घोषित किया जाता है। हिन्दू राजदर्शन में प्रजा का रंजन (प्रसन्न) करने वाले राजतंत्र का प्रायः समर्थन किया गया है। राजा, राज्य अथवा राष्ट्र का सर्वोच्च और सर्वोत्तम सत्ताधारी व्यक्ति होता है। राजा के लिए कहा गया है कि उसे देश, काल, परिस्थिति एवं शास्त्र का ध्यान रखते हुए व्यवहार करना चाहिए। उसे समयानुसार क्षमा, दया, कोप, युद्ध और मैत्री करनी चाहिए। मनु राजा की योग्यताओं का वर्णन करते हैं। मनु के अनुसार, राजा ‘सत्यवादी, समीक्षा परायण, बुद्धिमान, धर्म, अर्थ एवं काम त्रयवर्ण’ के वास्तविक रहस्य का ज्ञाता होना चाहिए।

मनुस्मृति में राजा के निम्नलिखित गुणों का वर्णन है (Raja ke Gun)

  1. राजा को ज्ञानी, विवेकी, मृदु एवं सत्यभाषी तथा शास्त्रानुसार कार्य करने वाला होना चाहिए।
  2. वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों, विद्वानों एवं वृद्धों के प्रति उसमें श्रद्धा होनी चाहिए।
  3. राजा को विनयशील होना चाहिए, जो राजा विनयशील नहीं होता उसका अन्त निकट होता है।
  4. राजा को संयमी, वेदों का ज्ञाता होना चाहिए। जो राजा काम, क्रोध, मद में फँस जाता है वह प्रजा का कल्याण नहीं कर सकता, यहाँ तक कि वह स्वयं नष्ट हो जाता है।
  5. राजा को युद्ध से भयभीत नहीं होना चाहिए, उसे सामर्थ्यवान होना चाहिए। अप्राहन्न को प्राप्त करने की इच्छा वाला होना चाहिए और जो प्राप्त है उसकी रक्षा और वृद्धि करने वाला होना चाहिए।
  6. राजा को काम प्रवृत्त नहीं होना चाहिए। यदि राजा काम प्रवृत्त हुआ तो उसमें निम्नलिखित बुराइयाँ आ जाएँगी, यथा-मृगया, जुआ, दिन में सोना, पराए की निंदा, राजा के कार्य तथा कर्त्तव्य स्त्री में आसक्ति, मद्यपान, नाच-गाने में आसक्ति और व्यर्थ भ्रमण। इनमें भी चार बुराइयाँ अत्यन्त पीड़ादायक हैं, यथा-मद्यपान, जुआ, स्त्री में आसक्ति और आखेट।
  7. राजा को क्रोधी नहीं होना चाहिए। यदि राजा क्रोधी हुआ तो वह इन बुराइयों को जन्म देगा, यथा चुगलखोरी, दुस्साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दूसरों के गुणों में दोष निकालना, धन का अपहरण करना, कठोर वचन बोलना और कठोर दण्ड देना। इनमें भी कठोर दण्ड प्रयोग, कटु वचन और दूसरे का धन हड़पना अत्यन्त कष्टदायी हैं। संक्षेप में राजा को कामी और क्रोधी नहीं होना चाहिए।

राजा के कार्य एवं कर्तव्य (Rajya ke Karya aur Kartavya)

राजा, शासन-व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु है। शासन के समस्त पदाधिकारियों की नियुक्ति राजा ही करता है। राजा का मुख्य कार्य प्रजा के हितों की वृद्धि करना है। मनु ने राजा के आठ कार्य बतलाए हैं-

  1. जनता से कर वसूल करना,
  2. राजदूतों की नियुक्ति करना,
  3. राज्य के कर्मचारियों को वेतन देना,
  4. शास्त्र द्वारा निषिद्ध कार्यों को न करना,
  5. किसी विषय पर बहुमत होने पर राजाज्ञा के अनुसार कार्य करना,
  6. अभियोगों का निर्णय करना,
  7. शत्रुओं से अपराध के अनुसार धन वसूलना,
  8. अपराधियों और पाप कर्म करने वालों से प्रायश्चित कराना।

राज्य की रक्षा करना राजा का कर्त्तव्य है। इस हेतु राजा का यह कार्य है कि वह गुप्तंचरों की नियुक्ति करे और उनसे प्राप्त सूचनाओं के अनुसार तैयारी करे।

मनु ने पाँच प्रकार के गुप्तचरों का वर्णन किया है (Manu Ke Gupchar ka)

  1. कापदिक-ये वे गुप्तचर हैं जो कपटी वेष धारण करके राज्य में भ्रमण करते हैं तथा राजा और उसके मंत्रियों के विरुद्ध यदि कोई षड्यंत्र किया जा रहा है तो उसकी सूचना राजा को देते हैं।
  2. उदास्थित-इस प्रकार के गुप्तचर संन्यासी वेष में राज्य में घूमते रहते हैं तथा राज्य के लोगों में राज्य और राजा के प्रति क्या धारणा है तथा कितना भक्ति भाव है? इसका पता लगाते रहते हैं।
  3. गृहपति-इस प्रकार के गुप्तचर गृहस्थ और कृषकों के रूप में जनता में घूमते हैं तथा इनका कार्य राज्य के प्रति जनता में आस्था बनाये रखना होता है।
  4. वैदेहिक-ये वे गुप्तचर हैं जो वृत्तिहीन व्यापारी बनकर व्यापारियों और किसानो में घूम-घूमकर यह जानकारी प्राप्त करते हैं कि कहीं राज्य के खिलाफ असन्तोष तो नहीं फैल रहा है। यदि कहीं असन्तोष फैल भी रहा हो तो ये गुप्तचर उसे दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
  5. तापस-ये वे गुप्तचर हैं जो तपस्वी के वेश में इधर-उधर घूमते-फिरते हैं तथा राजा के पक्ष-विपक्ष का पता लगाते रहते हैं। राजा का यह भी कर्त्तव्य है कि वह राज्य में अनुराग तथा अपराग का पता लगाए अर्थात् राजा के सम्बन्धियों, राजकुमारों, सेनापतियों, मंत्रियों, उच्च पदों पर कार्यरत अधिकारियों में कौन राज्य भक्ति रखता है और कौन नहीं रखता है? इसकी जानकारी एकत्र कर साथ ही यदि किसी प्रकार का असंतोष है तो उसे दूर करने के लिए उपाय बतलाएँ तथा षड़यंत्रों की जानकारी दें।

राजा का कर्त्तव्य (Raja Ke Kartavy)

राजा का यह भी कर्त्तव्य है कि वह यह पता लगाए कि पड़ोसी शासकों में कौन उसका मित्र है और कौन उसका शत्रु है और कौन तटस्थ अथवा उदासीन है। प्राप्त जानकारी के आधार पर राजा को अपनी नीति और कार्य निश्चित करने चाहिए। सशक्त पड़ोसी के विरुद्ध अन्य राजाओं से मिलकर कार्य करना चाहिए। उदासीन राजा को अपना मित्र बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। मित्र राजा के साथ उसे मित्र बनाए रखने के प्रयत्न करते रहना चाहिए।

राज्य में आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था बनाना राजा का प्रमुख कर्त्तव्य है। राजा की शान्ति व्यवस्था को चोर लोगों से खतरा रहता है। ये चोर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के हो सकते हैं। जो चोर जनता को छल-कपट द्वारा लूटते हैं वे प्रत्यक्ष चोर हैं। राज्य के जो कर्मचारी रिश्वत लेते हैं तथा भ्रष्टाचार फैलाते हैं, वे भी चोर हैं। दूसरे प्रकार के वे चोर हैं जो चोरी करते हैं, डकैती डालते हैं या लूटमार करते हैं। राजा का कर्त्तव्य है कि वह दोनों प्रकार के चोरों का दमन करे। भ्रष्ट कर्मचारियों को राज्य से निष्कासित कर देना चाहिए तथा उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति का हरण कर लेना चाहिए।

राज्य की प्रकृति (Rajy Ki Prkitik)

राज्य का सप्तांग सिद्धांत-राज्य के स्वरूप अथवा प्रकृति के सम्बन्ध में मनु ने विस्तार से विचार किया है। मनु ने राज्य के सावयत सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। मनुस्मृति में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। आधुनिक युग में राज्य के चार अंग माने गए हैं यथा-भू भाग, जनसंख्या, सरकार और संप्रभुता, इसके विपरीत मनु ने राज्य के सात अंग माने हैं। ये सात अंग हैं

  1. स्वामी (राजा)
  2. अमात्य (मंत्री) ,
  3. पुर (राजधानी) ,
  4. राष्ट्र (भूमि और जनसंख्या) ,
  5. कोष,
  6. दण्ड (सैन्यबल) एवं
  7. मित्र।

किसी भी राज्य में राजा का होना अनिवार्य है। राजा के पद को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। बिना राजा के राज्य में अराजकता फैल जाती है। एक प्रकार से देखा जाय तो राजा से ही राज्य की पहिचान है। राजा ही समाज में शान्ति और व्यवस्था स्थापित करता है। वही प्रजा के जीवन में सुख और शान्ति की स्थापना करता है।

निष्कर्ष:

दोस्तों आपने ऊपर दिए गए आर्टिकल के माध्यम से राज्य की उत्पत्ति (Rajya Ki Utpatti) और सिद्धांत के बारे में जाना आता है आपको ऊपर दी गई जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

और अधिक पढ़ें: मनु क्या है किसे कहते हैं?

मनु क्या है किसे कहते हैं? मनुस्मृति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी। Manu Ke Bare Me

नमस्कार आपका स्वागत है हम आर्टिकल के अंतर्गत मनु के बारे में (Manu Ke Bare Me) चर्चा करने वाले हैं। मनु का परिचय काल, मनुस्मृति क्या है? इसके विषय विभाजन क्या है? Manusmriti का रचनाकाल क्या है? सृष्टि के प्रारंभ में मानव जीवन व, मनु (Manu) के आध्यात्मिक एवं राजनीतिक विचार, आप इस आर्टिकल के अंतर्गत पढ़ने वाले हैं चलिए जानते हैं। मनु के बारे में (About Manu) विस्तार से जानकारी पूरा पढ़ें,

मनु क्या है किसे कहते हैं? (Manu Ke Bare Me)

भारतीय राजनीतिक चिन्तन मानव जीवन के सर्वांगीण विवेचना का एक भाग है। प्राचीन काल से ही मानव कल्याण का विचार भारतीय चिन्तन का केन्द्र बिन्दु रहा है। वेद, पुराण, उपनिषद, स्मृति, मीमांसा आदि ग्रंथों में मानव कल्याण की व्यापक और सर्वांगीण विवेचना प्रस्तुत की गई है। मनुष्य क्या है, उसका अन्तिम लक्ष्य क्या है? इन प्रश्नों ने आदिकाल से मानव मस्तिष्क को उद्वेलित किया है। प्राचीन ऋषियों और चिन्तकों ने मनुष्य को निरा राजनीतिक प्राणी ही नहीं माना है,

अपितु उसे सभी व्यवस्थाओं का मूल माना है तथा व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य मोक्ष निरूपित किया है। मोक्ष प्राप्ति के लिए समाज और मनुष्य के शरीर को साधन माना गया है। मानव धर्मशास्त्र व्यक्ति के उन धर्मों, कर्त्तव्यों और कार्यों को बतलाता है जिससे कि अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। अतः शुद्ध आचरण का निरूपण स्मृति करती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अतः उसका समाज में रहने वाले अन्य व्यक्तियों के संपर्क में आना स्वाभाविक और अनिवार्य है।

यह भी सम्भव है कि इस कारण परस्पर कोई विवाद उठे। विवाद आचरण में भूल के कारण उठते हैं। अतः भूल करनेवाले को दण्ड मिलना आवश्यक है। प्रायश्चित के अन्तर्गत दण्ड-व्यवस्था रखी गई है, इसकी विस्तृत चर्चा मनु करते हैं। मनुस्मृति में व्यापक रूप से व्यक्ति के आचार, व्यवहार, प्रायश्चित, वर्णव्यवस्था, आश्रम-व्यवस्था और मानव जीवन के लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, पुरुषार्थ की व्याख्या की गई है। इसी संदर्भ में राज्य, राजा, विधि और प्रजा के सम्बन्ध में विस्तृत विचार किया गया है।

हिन्दुओं का विधि साहित्य तीन वर्गों में बाँटा गया है, यथा-धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र और टीकाएँ। धर्मशास्त्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और मान्य है। धर्मशास्त्र में मनुस्मृति का स्थान सर्वप्रथम है। मनु को, जो मनुस्मृति के रचयिता हैं, धर्मशास्त्र का आदि प्रणेता माना गया है।

मनु का परिचय (Introduction to Manu)

हिन्दू धर्म ग्रन्थों में मनु का नाम सम्मान और आदर के साथ मिलता है। जनश्रुति और पौराणिक आख्यान के अनुसार बनु मानव जाति के आदि-पुरुष थे। मनु का नाम ऋग्वेद A में मिलता है। वेद के अनुसार मनु का प्रत्येक कथन महान् है। मनु ने मानव जाति को सामाजिक संगठन प्रदान किया तथा धर्म, कर्त्तव्य भाव की स्थापना की। तैत्तरीय संहिता में मानव जाति को मनु की संतान कहा गया है। पुराणों में मनु का उल्लेख चौबीस बार हुआ है।

Manusmriti (मनुस्मृति) में भी मनु का परिचय दिया गया है। मनु मानव जाति के पूर्व पुरुष हैं। जब भगवान विष्णु ने सृष्टि रचने का विचार किया तो सृष्टि रचने की इच्छा के साथ ही नाभि प्रदेश से कमल और उस पर आसीन ब्रह्मा प्रकट हुए। ब्रह्मा ने सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार को प्रकट किया। सृष्टि वृद्धि के लिए ब्रह्माजी ने स्वयं को अर्द्ध नारीश्वर रूप में आधा भाग स्त्री और आधा भाग पुरुष का संयोजित किया। उनसे स्वयं मनु और उनकी सहचरी शतरूपा उत्पन्न हुईं।

मनु और शतरूपा के मारीच, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलइ, ऋतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु, नारद दस प्रजापति उत्पन्न हुए। इन प्रजापतियों से सात अन्य मनु तेजस्वी महर्षि उत्पन्न हुए तथा यहीं से आगे सृष्टि वृद्धि का क्रम निरन्तर चलता रहा। मनुस्मृति में कहा गया है कि प्रथम मनु ने उन धर्मों को घोषित किया जिन्हें ईश्वर ने मनुष्यों के लिए मनु को बताया था। मनु अमर और शाश्वत हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार प्रत्येक मन्वंतर का एक मनु होता है। पुराण चौदह मनु की चर्चा करते हैं।

प्रत्येक मन्वंतर अरबों वर्ष का होता है तथा प्रत्येक मन्वंतर का स्वामी एक मनु होता है। उसी से मन्वतर का नाम जाना जाता है। अब तक छह मनु का शासन काल हो चुका है। वर्तमान में सातवें मनु वैवस्पन मनु का शासन काल है। भविष्य में अभी सात मनु का शासनकाल और आना है। प्रत्येक मन्वतर में चार युग (कृत, त्रेता, द्वापर व कलियुग) होते हैं। इनकी समाप्ति पर धार्मिक कार्य करने वाला तथा धर्म का ज्ञाता पुरुष नए मन्वतर के लिए बच जाता है। वही पुरुष नए मन्वतर और युग कोप्राचीन धर्म और संस्थाओं का ज्ञान कराता है तथा नये युग और मन्वतर के अनुरूप पुराने धर्म को घोषित करता है। इस प्रकार प्रत्येक मन्वतर का एक मनु होता है, मेघा तिथि, जो मनुस्मृति के टीकाकार हैं, का कहना है कि मनु किसी व्यक्ति का नाम नहीं अपितु पद का नाम है।

मनुस्मृति क्या है किसे कहते हैं (Manusmriti Ke Bare Me)

नारद स्मृति में कहा गया है कि प्रथम मनु की प्रार्थना पर ब्रह्मा ने मनुष्य के आचारव्यवहार के लिए धर्मशास्त्र की रचना की जिसमें एक लाख श्लोक और एक सहस्र अध्याय थे। मनु ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश, मारीच आदि ऋषियों को दिया। इन ऋषियों से यह ज्ञान भृगु को प्राप्त हुआ। भृगु द्वारा जो नियम घोषित किए गए उनका संग्रह मनुस्मृति है। ब्रह्मा ने मनुष्य के आचार-व्यवहार के लिए जिस धर्मशास्त्र की रचना की, वह काफी व्यापक था।

कालान्तर में यह संक्षिप्त होता गया। नारद स्मृति में कहा गया है कि नारद ने इस धर्मशास्त्र को संक्षिप्त कर बारह सहस्र श्लोकों में सीमित किया। मार्कण्डेय मुनि ने इसे पुनः सीमित कर आठ सहस्र श्लोकों में तथा सुमि भार्गव ने इसे चार सहस्र श्लोकों में सीमित किया। यद्यपि मनुस्मृति भृगु द्वारा सम्पादित की गई है तथापि इसका नाम मनुस्मृति रखा गया है। मनुस्मृति का शाब्दिक अर्थ है, ‘मनु के उपदेशों का स्मरण’। वर्तमान मनुस्मृति में बारह भाग हैं, तथा कुल श्लोकों की संख्या दो हजार छह सौ चौरानबे है।

मनुस्मृति का विषय विभाजन

Manusmriti व्यापक ग्रन्थ है। इसमें केवल राजनीतिक व्यवस्थाओं और मान्यताओं का ही उल्लेख नहीं है अपितु सृष्टि की रचना, समाज की रचना, व्यक्ति समाज सम्बन्ध, व्यक्ति के जीवन को संचालित करने वाले नियम, धर्म, व्यवहार आदि की व्यापक चर्चा और व्यवस्था है। स्पष्टतः मनुस्मृति एक व्यापक रचना है। मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं, प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति, मन्वतरों की कथा, युग के अनुसार धर्म की चर्चा, वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति आदि की चर्चा की गई है।

द्वितीय अध्याय में धर्म की परिभाषा, संस्कारों की महत्ता, जाति आदि की चर्चा है। तृतीय अध्याय में ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन, विवाह, गृहस्थ, धर्म आदि की चर्चा है। चतुर्थ अध्याय में गृहस्थाश्रम, भोजन, भिक्षादान आदि की चर्चा है। पाँचवें अध्याय में जन्म, मृत्यु की अशुद्धियों, स्त्रियों को विधवाओं के धर्म की चर्चा है। छठवें अध्याय में-में पारिव्राजक तथा संन्यासी के धर्म की चर्चा प्रमुख रूप से की गई है। सातवें अध्याय में राजधर्म पर विचार किया गया है।

आठवें अध्याय में राजा के धर्म और न्याय व्यवस्था पर विचार किया गया है। नवें अध्याय में पति-पत्नी सम्बंधी धर्म, विवाह, उत्तराधिकार, स्त्रीधन आदि की चर्चा है। दसवें अध्याय में ब्राह्मण के कार्य, चतुर्वर्ण, आपदधर्म आदि की चर्चा है। ग्यारहवें अध्याय में दान तथा प्रायश्चित पर विचार किया गया है। बारहवें और अन्तिम अध्याय में भट्टर्षियों और भृगु के प्रश्नोत्तर, धर्मगुण, आत्मज्ञान, मोक्ष, परमात्मा दर्शन आदि की चर्चा की गई है।

मनुस्मृति का रचनाकाल (Manusmriti Rachna Kal)

Manusmriti प्राचीनतम ग्रन्थों में से है, क्योंकि प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में रचना के समयकाल का उल्लेख प्रायः नहीं मिलता। अतः यह कहना कठिन है कि इसका रचनाकाल कब का है? अनेक विद्वानों ने अपने-अपने शोध के आधार पर मनुस्मृति के रचना के समय को निर्धारित किया है। फलत: रचनाकाल के प्रश्न पर भिन्नता स्वाभाविक है। डॉ. बी. के. सरकार का मत है कि मनुस्मृति का रचनाकाल 150 ई. पू। के पहिले का नहीं है।

डॉ. यू. एन. घोषाल का मानना है कि मनुस्मृति का काल 200 ई.पू। से 300 ई.पू। के मध्य का है। डॉ. हन्टर का मत है कि मनुस्मृति 600 ई. पू। की रचना है। मेघातिथि ने अन्य भाष्यों का भी उल्लेख किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि मनुस्मृति 7वीं ईसवी सदी तक अधिकृत रूप से धर्मग्रन्थ के रूप में मान्य की जा चुकी थी। डॉ. काणे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ के तीसरे स्थान में लिखा है कि दूसरी ईसवी शताब्दी के बीच मनुस्मृति का वर्तमान रूप अधिकृत ग्रन्थ बन चुका था।

अतः मनुस्मृति दूसरी ई. पू। से दूसरी ईसवी शताब्दी के बीच किसी भी समय लिखी गई होगी। काल-निर्धारण का विषय केवल यह है कि लिपिबद्ध रूप से मनुस्मृति कब से हमें उपलब्ध है? इस रूप में हम उसके समय को कभी का भी सुनिश्चित करें, पर यह निश्चित है किं मनुस्मृति प्राचीनतम ग्रन्थ है। प्राचीन परम्परा में यह मौखिक रूप से विद्वानों द्वारा कंठस्थ की गई, बाद में इसे लिपिबद्ध किया गया।

Importance of Manusmriti (मनुस्मृति की महत्ता)

हिन्दू समाज में मनुस्मृति की महत्ता निर्विवाद है। मनुस्मृति द्वारा निर्देशित मान्यताओं के आधार पर ही सम्पूर्ण समाज की व्यवस्था और आचार-व्यवहार प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज में सामाजिक परम्पराओं, रीति-रिवाजों और आचार-विचार की संरचना मनुस्मृति के कारण हो रही है। मनुस्मृति का प्रभाव केवल भारत में ही देखने को नहीं मिला अपितु समूचे दक्षिण पूर्व एशिया में देखने को मिलता है।

मनुस्मृति भारतीय सांस्कृतिक, सामाजिक जीवन का आधार रही है। श्रुति और स्मृतियों ने हिन्दू जीवन पद्धति और मान्यताओं को स्थापित किया है। श्रुति या वैदिक ज्ञान और सिद्धान्त को ऋषियों एवं मुनियों ने जब व्यावहारिक रूप दिया तो वे स्मृतियाँ बनीं। श्रुतियों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे स्वयं ब्रह्मा के वचन हैं, पर स्मृतियों में जिन सिद्धान्तों और कर्त्तव्यों का उल्लेख किया गया है, उनका निरूपण अथवा उनकी बौद्धिक व्याख्या विद्वानों द्वारा की जा सकती है। इस क्रम में मनुस्मृति का उल्लेख किया गया है, उनका निरूपण अथवा उनकी बौद्धिक व्याख्या विद्वानों द्वारा की जा सकती है। मनुस्मृति इसी स्मृति की श्रेणी में आती है।

Manusmriti को मानव धर्मशास्त्र भी कहा गया है। इसमें सतही तौर पर नहीं अपितु व्यापक और गम्भीरता के साथ इस प्रश्न पर विचार किया गया है कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है? समाज का स्वस्थ कल्याण कैसे हो सकता है? व्यक्ति और समाज के बीच सम्बन्ध कैसे स्थापित किए जा सकते हैं? मनुष्य अपने दायित्वों को कैसे पूरा कर सकता है? सामाजिक और व्यक्तिगत अनुशासन कैसे स्थापित किया जा सकता है?

समाज में सभी प्रकार की प्रकृति, स्वभाव, गुणधर्म के लोग कैसे पारस्परिक तालमेल स्थापित कर सकते हैं और सार्वजनिक एवं निजी हितों को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? संक्षेप में मनुस्मृति में मानवयुग का व्यापक विचार किया गया है कि व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास कैसे सम्भव है? मनुस्मृति में विभिन्न प्रकार की प्रकृति के व्यक्तियों के कर्त्तव्यों (धर्म) का उल्लेख समन्वयात्मक दृष्टि से स्थापित किया है। मनुस्मृति ने नैतिक पक्ष पर बल दिया है। मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में मनुस्मृति का महत्त्व है।

मनु के आध्यात्मिक एवं सामाजिक विचार: (Manu Ke Vichar)

मनुस्मृति में शाश्वत् और आध्यात्मिक प्रश्नों और जिज्ञासा का विस्तृत वर्णन किया गया है। जगत् क्या है? इसका स्वरूप कैसा है? इसका प्रारम्भ कैसे हुआ? मानव जीवन का लक्ष्य क्या है? मृत्यु के पूर्व क्या था? मृत्यु के बाद क्या होगा? ये कुछ शाश्वत् प्रश्न हैं जिनके सम्बन्ध में मनुस्मृति में विचार किया गया है।

सृष्टि का प्रारम्भ और मानव जीवन: (First Human Life)

मनु का मत है कि समस्त ब्रह्माण्ड ईश्वर की लीला है, परमात्मा अतीन्द्रिय, अनन्त और नित्य है। परमात्मा के क्षतिरूपी बीज से ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्मा के विभिन्न प्रकार के कर्मों की विवेचना के लिए उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म का विचार बनाया गया। धर्म से सुख और अधर्म से दुःख मिलता है। इस लोक की वृद्धि के लिए ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और पैर से शूद्र की रचना हुई उन सबके पृथक-पृथक कर्म और धर्म निर्धारित किए गए।

कर्म ही हमारे जीवन को निर्मित करते हैं। सभी कुछ कर्मों का फल है। कर्म जड़ चेतन सम्पूर्ण प्रकृति में नैसर्गिक रूप से चलते हैं। मनुष्य विवेकशील प्राणी है। मनुष्य अपने विवेक से अच्छे बुरे का ज्ञान रखते हुए कर्म करता है। सम्पूर्ण प्रकृति में मनुष्य ईश्वर की श्रेष्ठ रचना है। मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, ब्राह्मण में भी विद्वान् ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं और विद्वान ब्राह्मणों में भी वे श्रेष्ठ हैं जो धर्म के पालन की आवश्यकता समझते हैं पर इनमें भी अति श्रेष्ठ वे हैं जो धर्मानुसार कार्य करते हैं। मनुष्य धर्मानुसार (कर्त्तव्यानुसर) कार्य करते हुए अपने अन्तिम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। मनु कहते हैं कि व्यक्ति का अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है।

निष्कर्ष:

दोस्तों आपने ऊपर दिए गए कंटेंट के माध्यम से मनु के बारे में, साथ में मनुस्मृति के विषय सिद्धांत और रचनाकार के बारे में विस्तार से जानकारी पढ़ी। आशा है आपको ऊपर दी गई जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी। Manu Ke Bare Me पढ़ने के लिए धन्यवाद,

और अधिक पढ़ें: Vyaktitva Vikas || व्यक्तित्व विकास एवं इतिहास बोध

Happy new year 2023 | नया साल मुबारक हो | शुभकामना संदेश

Happy new year: नया साल मुबारक हो, आपका और आपके परिवार मैं सदा खुशहाली रहे यही शब्दों के साथ Happy Festival आपको नए वर्ष की शुभकामना देता है। आपका नया वर्ष कैसा रहे? बीते हुए वर्ष के बारे में कुछ, अपने दोस्तों और परिवार को शुभ संदेश कैसे भेजे? तमाम प्रकार की जानकारी आप इस आर्टिकल में पढ़ने वाले हैं आप भी अपने दोस्तों को Happy new year न्यू वर्ष 2023 मिस करें। चलिए स्टार्ट करते हैं,

नया साल मुबारक हो
नया साल मुबारक हो

Happy new year 2023

नया वर्ष आपको मंगलमय, साथ में आपके परिवार में तमाम प्रकार की खुशियाँ लाए, बीते वर्ष 2022 में हमने कुछ पाया कुछ खोया। नया वर्ष 2023 हमें एक उत्साह और नई उमंग के साथ प्रेरित करेगा। आप अपने परिवार और दोस्त रिश्तेदारों मित्रो के बीच हमेशा खुशहाली से खिले रहें।

साथ में आपने जो सोचा है आप उन मकसद को पूरा 2023 में करें। यही संदेश हम आप सबके लिए देते हैं। आपके अरमानों के बीच बागवानी हमेशा खिलती रहे और आपके आने वाले भविष्य के हमेशा सुखद एवं मंगलमय कामना करते हैं।

आप अपने परिवार देश समाज और राष्ट्र में आप अपने नाम की कीर्ति बने। मालिक हम सब पर दया करें। आने वाली मुसीबतों परेशानियों से हमें छुटकारा मिले। Happy new year 2023 मेरी तरफ से आप सभी के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ, आपको नया वर्ष मुबारक हो चलिए इस पर भी हम अपने विचार व्यक्त करते हैं।

नया साल मुबारक हो 2023

नया वर्ष हमेशा नई उमंग और उत्साह और जोश के साथ हम सबके जीवन में देखने को मिलेगा। आने वाले दिनों में हम कुछ नया ऐसा करने जा रहे हैं या आप जो नया कर रहे हैं। उसमें परमपिता परमात्मा हमारी मदद करेगा। क्योंकि हम नए जोश उमंग के साथ आगे बढ़ने वाले हैं।

पिछले वर्ष 2022 में हमने कुछ पाया, कुछ खोया, कुछ परेशान, हताश निराश रहे। लेकिन आने वाला वर्ष 2023 हम सबके लिए सुखद में होगा। क्योंकि हम सभी जानते हैं कि निकले या गुजरे हुए जमाने में हम अपनी कमियों को देखते हैं उन कमियों को पूरा हम आने वाले वर्ष में कर सकते हैं। वर्ष 2023 हम आप सब को सुख में हो और जीवन में हमेशा खुशहाली बनाए रखें।

पिछले 365 दिन हमारे लिए काफी अच्छे रहे और आने वाले हर दिन और रात में हम उस परमात्मा की दया और कृपा लेकर, अपने इष्ट देव का ध्यान करके हम अपना देने कार्य प्रारंभ करें। हमें मालिक कामयाबी जरूर देगा।

मैं वेबसाइट एडमिन आपको “नया साल मुबारक हो” ऐसे शब्दों को व्यक्त करता हूँ। आप हमेशा खुशहाल रहे, जीवन में नई तरक्की लाए और सुखी संपन्नता प्रगट हो। मेरे इस आर्टिकल को पढ़ने वालों के हमेशा जीवन में खुशहाली बनी रहे और अपने मकसद में कामयाब रहे।

नया साल मुबारक हो कैसे लिखते हैं?

अब हम बात करते हैं कि नया साल मुबारक हो, कैसे अपने दोस्त रिश्तेदारों मित्रो को लिखें? तो इसके लिए दोस्तों इंटरनेट पर बहुत कुछ ऐसी इमेज मिल जाएंगे, Happy new year 2023 Images को डाउनलोड करके आप अपने दोस्त और रिश्तेदारों को नए साल मुबारक भेज सकते हैं।

इसके अलावा आप हमारे इस आर्टिकल को भी अपनी तरफ से भेज सकते हैं। जो नया जीवन एक उत्साह और उमंग प्रगट करेगा। नया साल मुबारक हो आपको अपने दोस्तों रिश्तेदारों को अपने टैक्स के माध्यम से भी दोहरा सकते हैं और लिख सकते हैं।

Happy new year नया साल 2023 आपको और आपके परिवार को मुबारक हो, ऐसे शब्दों के साथ हम अपने दोस्त रिश्तेदारों मित्रो को नए साल की मुबारकबाद दे सकते हैं। साथ में उन्हें कुछ संदेश भी लिख सकते हैं।

नववर्ष की शुभकामना संदेश

नए वर्ष 2023 की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ, आपके फैमिली बच्चे परिवार बूढ़े माता-पिता सभी को ढेर सारी शुभकामनाएँ, दोस्त रिश्तेदारों को ही इस वेबसाइट एडमिन की तरफ से नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ, अपने शुभ संदेशों को अपने टैक्स के माध्यम से या कुछ इमेज के माध्यम से,

व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर व अन्य सोशल नेटवर्क के माध्यम से अपने दोस्तों रिश्तेदारों को नए वर्ष की शुभकामना संदेश भेज सकते हैं। या आने वाला पर्व 2023 हमें बहुत ही कुछ देने वाला है। हमें सिर्फ अपने आने वाले दिनों के प्रतीक्षा करना है हर 1 दिन नए जोश उमंग के साथ अपने आपको प्रभु मदत करे।

आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 2023

मेरी तरफ से आपको और आपके परिवार को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ, साथ में मैं चाहता हूँ कि जीवन में हमेशा खुशियाँ बनी रहे और परिवार के साथ सुखमय जीवन व्यतीत रहे। साथ में आप आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं तो ऐसी आर्थिक तंगी को परमात्मा हमारे अंदर ऐसी सद्बुद्धि दें कि,

हम एक नई ऊर्जा से अपनी अर्थव्यवस्था को बनाने या पैसा कमाने में कामयाब हो, अपने परिवार में खुशियाँ और उमंग लाने में हमेशा एक्टिव रहें। ऐसी शुभकामनाएँ मेरी तरफ से आपको और आपके परिवार को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 2023 हमेशा खुशियों से भरा रहे।

नया साल की शुभकामना

Happy new year 2023: नए साल की शुभकामनाएँ, दोस्तों इन्हीं शब्दों के साथ मेरा इस आर्टिकल को लिखने का मकसद यही था कि मैं भी अपने दोस्तों और अपने वेबसाइट विजिटर या पढ़ने वाले भाई बंधु रिश्तेदार बहन माता पिता सभी को मेरी तरफ से नई साल की शुभकामना। हमेशा जीवन खुशहाल बना रहे। इन्हीं शब्दों के साथ जय हिंद हमेशा हैप्पी न्यू ईयर 2023,

और अधिक पढ़ें Happy Festival

Vyaktitva Vikas || व्यक्तित्व विकास एवं इतिहास बोध

व्यक्तित्व विकास और इतिहास बोध इस उपलक्ष्य में कुछ महा महान विचारकों के विचार हैं Vyaktitva Vikas प्रारंभ कब कैसे हुआ? कैसे मानव जीवन में एक विकास देखने को मिला। आदि महत्त्वपूर्ण बातें इस आर्टिकल में आप पढ़ने वाले हैं चलिए जानते हैं Vyaktitva Vikas के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी।

Vyaktitva Vikas
Vyaktitva Vikas

व्यक्तित्व विकास। Vyaktitva Vikas

Vyaktitva के सर्वांगीण विकास का एक सर्वमहत्त्वपूर्ण साधन, इतिहास बोध है। कहा गया है कि दृष्टि बदलने से सृष्टि बदलेगी। दृष्टि को बदलने का हौसला एवं सामर्थ्य इतिहास बोध (History Sense) प्रदान करता हैं। इतिहास में हमें ऐसे महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग मिलते हैं, जिन्होंने अपना सारा जीवन देश, समाज और संस्कृति (culture) के उद्धार में लगा दिया। तप, त्याग, बलिदान और लोक कल्याण ही जिनका जीवनोद्देश्य रहा।

उन्होंने अपने सामने एक ऊँचा आदर्श रखा, आवश्यकता पड़ने पर न केवल स्वार्थ का बलिदान किया अपितु जीवन का उत्सर्ग तक कर दिया। उनकी कथनी और करनी में कभी अन्तर नहीं रहा। जो कहा वह कर दिखाया। वांछित आदर्श को प्राप्त कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि निर्धनता, शारीरिक त्रुटियाँ (Physical Errors) या साथी सहायकों का अभाव ऐसी बातें नहीं हैं जिनके कारण हम प्रगति के पथ पर अग्रसर होने से निराश हो जायें।

उन्होंने अपने व्यक्तित्व (personality) एवं कृतित्व से यह भी साबित कर दिया कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों की अग्निपरीक्षा मनुष्य में शौर्य-साहस, संकल्प शक्ति, दृढ़ निश्चय और कर्मण्यता का गुण उत्पन्न कर देती है जिनसे वह निर्धारित लक्ष्य की ओर प्रगति मार्ग में बहुत तेजी से बढ़ता है और शान्ति, बुद्धि एवं साधन सम्पन्न लोगों से भी आगे निकल जाता है।

इतिहास बोध हमें पीड़ित मानवता के अनन्य सेवकों के रूप में ऐसे महापुरुषों से परिचित कराता है जिनकी त्याग, निष्ठा, समर्पण, साधना के बलबूते पर ही विश्व वसुधा प्रगति को प्राप्त हो पायी एवं उनके प्रयासों के माध्यम से ही आज मानवता को हम जीवित पाते हैं। इन्होंने अपनी परिधि ‘स्व’ से ऊँची उठाकर समस्त वसुधा रूपी कुटुम्ब (वसुधैव कुटुम्बकम्) के स्तर तक पहुँचा दी एवं मानव मात्र के लिए प्रेरणा के स्रोत बन गए।

Vyaktitva se aap kya samajhte hain

ब्रिटिश सत्ता (British power) की भारत में स्थापना के उपरान्त जब उन्हें भारतीय सामाजिक मामलों में न्याय करने में परेशानी आयी तब उन्होंने 1776 ई. में ‘मनुस्मृति’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘A Code of Gentoo Laz’ के रूप में करवाया। Acharya Mahavir Prasad Dwivedi ने लिखा है-‘ इसे देखकर यूरोप के विद्वत जगत में खलबली मच गई।

उन्होंने कहा-जिस जाति के ज्ञान भण्डार में ऐसी पुस्तकें विद्यमान हैं उसका भूतकाल बड़ा ही उज्ज्वल रहा होगा, उसमें ऐसे-ऐसे न जाने कितने ग्रंथ पड़े होंगे अतएव इस जाति के पूर्व इतिहास से परिचय प्राप्त करने से अनेक लाभ होने की सम्भावना “।” इसी लाभ के उद्देश्य से कलकत्ता में Sir William Jones (1746-1794) के प्रयासों से 15 जनवरी, 1784 को ‘Asiatic Society’ की स्थापना की गई।

इसी के तत्वावधान में 1785 में Charles Willikins महोदय ने भगवद्गीता का भी अंग्रेजी अनुवाद किया। यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत सीखने में रुचि ली। जर्मन विद्वान Maxmuller (1823-1902) ने भारतीय विद्या के अध्ययन को बढ़ावा दिया। उनके सम्पादकत्व में ‘Second Books of the East Series’ के पचास खण्डों में वृहद् पैमाने पर प्राचीन धर्म ग्रन्थों का अनुवाद किया गया।

मानव बुद्धि की सर्वोच्च उपज

यूरोपियों के साथ-साथ भारतीय भी प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में रुचि रखते थे। आर्य समाज के संस्थापक Swami Dayanand Saraswati ने तो ‘वेदों की ओर लौट चलो’ का नारा तक दे डाला। प्रख्यात जर्मन दार्शनिक शापेन् हावर ने उपनिषदों को मानव बुद्धि की सर्वोच्च उपज करार दिया। जर्मन विद्वान Hern Wilhelm ने भगवद्गीता को एक उच्च कोटि का ग्रंथ कहा।

Swami Vivekanand ने कहा कि ‘गीता उपनिषदों के उपवन से चुने हुए आध्यात्मिक सत्यों के सुन्दर पुष्पों का एक गुच्छा है।’ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना Pandit Madanmohan Malviya ने कहा था ” मेरा विश्वास है कि संसार की सभी जीवित भाषाओं में ज्ञान से परिपूर्ण इतनी छोटी पुस्तक कोई नहीं है, जितनी कि भगवद्गीता है। इसमें मनुष्य को सर्वोच्च ज्ञान, पवित्रतम् प्रेम और सर्वोत्कृष्ट कर्म की शिक्षा मिलती है।

गीता आत्म संयम, त्रिविध तप, अहिंसा, सत्य, करुणा, कर्त्तव्य के लिये कर्त्तव्य का पालन करना और अधर्मी के विरुद्ध संघर्ष करने की शिक्षा देती है। मेरी दृष्टि में विश्व साहित्य में Bhagavad Gita जैसी महान रचना कोई नहीं हैं। “

महात्मा गांधी ने भी कहा

भारतीय इतिहास के महान उन्नायक Mahatma Gandhi ने भी कहा है-‘ गीता जगत जननी है। वह किसी को निराश वापस नहीं करती। उसका द्वार उन सबके लिए खुला है जो उसमें प्रवेश करना चाहते हैं मुझे गीता में वह शांति और संतोष मिला है जो पर्वत पर दिये गये उपदेश में भी उपलब्ध नहीं है।

जब कभी मुझे निराशा घेरती है और कहीं से कोई प्रकाश किरण नहीं मिलती है, मैं अविलम्ब भगवद्गीता के पास जाता हूँ। जहाँ-तहाँ कुछ श्लोंकों को टटोलते ही घोर निराशा के अंधकार में भी प्रसन्नता की एक किरण चमक उठती है। मेरा जीवन तो बाह्य कठिनाइयों और दुःखों से भरा पड़ा है। यदि मेरे ऊपर उनका कोई अमिट प्रभाव नहीं पड़ सका है तो उसका श्रेय मुझे प्राप्त Bhagavad Gita की शिक्षा को ही जाता है। ‘

महापुरूषों के व्यक्तित्व

भगवद्गीता की भाँति ही भारतीय बौद्ध साहित्य एवं संस्कृति ने भी महापुरूषों के व्यक्तित्व को आलोकित करने में अहम भूमिका निभाई है। तिब्बत, चीन एवं श्रीलंका सहित अधिकांश एशियाई देशों की आध्यात्मिक उन्नति का श्रेय बौद्ध धर्म को ही जाता है। भारत के कतिपय महापुरुषों के व्यक्तित्व (vyaktitva) को बौद्ध धर्म की शिक्षाओं ने गहराई तक प्रभावित किया।

इनमें सागर विश्वविद्यालय Post के संस्थापक ‘Mahadanveer’ डॉ. सर हरीसिंह गौर (1870–1949) , संविधान निर्माता Dr. Bhimrao Ambedkar (1891-1956) एवं महापण्डित राहुल सांस्कृत्यायन के बौद्ध दर्शन के ज्ञान को देखते हुए उन्हें 3 दिसम्बर, 1928 ई. को “tripitakacharya” की उपाधि तक प्रदान की। रूस के प्रो. श्चेरवात्सकी एवं पेरिस के सिल्वॉलेवी भी बौद्ध धर्म से प्रभावित थे।

1934 में प्रो. Silvolevy ने लिखा था-मेरे जीवन तथा मेरे प्रयत्नों का एक बड़ा भाग बौद्ध विषयक ज्ञान के प्रचार में व्यय हुआ है और जब तक मुझमें कार्य करने की शक्ति है तब तक प्रसन्नता पूर्वक उसी कार्य में लगा रहूँगा। न तो भारतवर्ष और न मानव समाज ही बौद्ध धर्म से बढ़िया कोई दूसरा फल उत्पन्न करने में सफल हो सका है। खास तौर पर मुझे खुशी होगी राहुल सांस्कृत्यायन के साथ काम करने में, क्योंकि मैं भिक्षु राहुल की गणना बौद्ध धर्म के वर्तमान सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में करता हूँ और उन्हें बौद्ध आदर्शों का एक प्रतिनिधि मानता हूँ। -डॉ. बी. के. श्रीवास्तव

निष्कर्ष

ऊपर दिए गए आर्टिकल के माध्यम से आपने happy festival वेबसाइट के अंतर्गत आपने व्यक्तित्व विकास (Vyaktitva Vikas) का इतिहास और बोध के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी पढ़ी। आशा है आपको ऊपर दी गई जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी। आर्टिकल पढ़ने के लिए धन्यवाद।

और अधिक पढ़ें: भारतीय दिनचर्या में विज्ञान सुबह से शाम तक

भारतीय दिनचर्या में विज्ञान सुबह से शाम तक Dinacharya In Hindi

Dinacharya In Hindi महत्त्वपूर्ण जानकारी के साथ इस आर्टिकल की शुरुआत करते हैं। भारतीय दिनचर्या में विज्ञान की क्या भूमिका है? विज्ञान हमारे दिनचर्या में कैसे सहायक होती है? Daily Routine जीवन बनाने से क्या लाभ होता है? सुबह से शाम तक भारतीय दिनचर्या मनुष्य जीवन के बारे में यह महत्त्वपूर्ण आर्टिकल है आप इसे पूरा पढ़ें। तो चलिए शुरुआत करते हैं।

Dinacharya In Hindi
Dinacharya In Hindi

Dinacharya In Hindi (दिनचर्या)

सबसे पहले दिनचर्या को समझते हैं यह क्या है? जैसे कि दोस्तों आप रोजाना ऑफिस जाते हैं ऑफिस जाने से पहले आप घर पर सुबह उठते ही क्या करते हैं? और दिन भर आप जब तक रात्रि में सोते नहीं तब तक क्या-क्या कार्य किया? यह आपको Daily Routine प्रोग्राम कह सकते हैं। या दैनिक Dinacharya कह सकते हैं। इंसान Life Dinacharya को एक स्वस्थ एवं एक्टिव बनाता है।

आप यदि नियमित कोई कार्य करते हैं तो आपकी दिनचर्या अच्छी फिटनेस के हिसाब से हो सकती है। कोई भी चाहे छोटा गरीब या बड़ा बिजनेसमैन हो अपने Daily Routine कार्यक्रम के तहत काम करें तो नियमिता शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक एवं आरामदायक, साथ में आपकी मानसिक संतुलन को बनाए रखने में विशेष कार्य करती है।

वास्तव में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने डेली रूटीन कार्यक्रम को नियमित करते हैं और समय पर पूरा करते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जिनको भिन्न-भिन्न कार्य करने में मन लगता है या उसे सही समय पर नहीं कर पाते हैं। लेकिन Daily Routine दिनचर्या प्रोग्राम विशेषकर सुबह उठ करके और शाम सोने से पहले कुछ ऐसे कार्य होते हैं जो आपको रोजाना करना होता है।

भारतीय दिनचर्या में विज्ञान (science in indian routine)

Bhariye Dinacharya me since: भारतीय ऋषि उच्चकोटि के अनुसंधानकर्त्ता और वैज्ञानिक थे, वे समस्त अनुसंधान में व्याप्त हो गए थे। उन्होंने जीवन शैली को पूर्ण वैज्ञानिक तरीके से ही विकसित किया। इसका उदाहरण पर्यावरण सुरक्षा में देख सकते हैं। पर्यावरण संतुलन का आधार वन, पर्वत और नदियों की सुरक्षा है।

भारत में नदियों को माता कहा गया, वन संपदा को वनदेवी माना गया और पर्वत के पत्थर में ईश्वर की कल्पना की गई। आस्था एवं आराधना से अधिक सुरक्षा का उपाय दूसरा नहीं होता। उन्होंने आस्था-श्रद्धा उत्पन्न करके नदियों, पर्वतों और वनों की सुरक्षा कर ली थी जैसे ही विपरीत मानसिकता की सत्ताएँ प्रभारी हुईं।

उन्होंने नगरों की गंदगी नदियों में डालना शुरू की, पर्वतों और वनों की अंधाधुंध कटाई शुरू की तो पर्यावरण असंतुलन हो गया। ‘ ग्लोबल वार्मिंग शुरू हो गई। ग्लेशियर पिघलने लगे, समंदर का वाटर लेवल बढ़ने लगा और धरती के जीवन को खतरा उत्पन्न हो गया।

बहुत छोटी-छोटी परंपरा (little tradition)

बहुत छोटी-सी बात भारत में परंपरा रही है ‘राख और नमक’ से मंजन करने की, अब टूथपेस्ट के प्रचार में पूछा जाता है, तुम्हारे टूथपेस्ट में नमक है यानी प्राचीन भारत में शरीरविज्ञान इतना उन्नत था कि उन्हें यह प्रचार करने की जरूरत नहीं थी कि दाँतों की हिफाजत के लिए नमक चाहिए बल्कि हर इंसान जानता था।

भोजन के लिए हाथ धोकर कपड़े से पोंछे नहीं जाते थे। केवल सुखाए जाते थे। कई बार रूमाल और तौलिया की नमी में बैक्टिरिया हो सकते हैं। हाथ पोंछने में वह हाथ में और भोजन करने में भीतर जा सकता है। अंतरिक्ष विज्ञान गाँवगाँव में फैला था। आज भी गाँव का पंडित केवल पंचांग देख कर सूर्योदय, सूर्यास्त का समय बताता है, सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण की तिथि-समय बताता है उसमें एक सेकंड का अंतर नहीं आता।

भारत में भोजन, वस्त्र, आवास, खेती, शिक्षा सब वैज्ञानिकता के आधार भर थे लेकिन लगातार आक्रमणों से पूरा ढाँचा चरमरा गया और जो बचा वह कर्मकांड में खो गया। आज जरूरत। भारत की परंपराओं को अंधविश्वास और कर्मकांड से मुक्त कर प्रचारित करने की। उसी में मानव का कल्याण और भारत की प्रतिष्ठा भी।

डेली रूटीन में विज्ञान (Science in the Daily Routine)

दोस्तों जैसे कि आप जानते हैं हमारे दैनिक जीवन में विज्ञान का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। आज भी हम विज्ञान के युग के साथ चल रहे हैं और इसके साथ-साथ हम रोजाना विज्ञान के अनुसंधान किए गए कुछ महत्त्वपूर्ण सामानों को यूज करते हैं, जो हमारे दिनचर्या में मददगार होते हैं।

R- दैनिक दिनचर्या के बारे में उपयोगी पाठ

आजकल आप सुबह उठेंगे, उसके बाद मंजन करेंगे यह विज्ञान ने कुछ कर दिखाया है जो आपके दातों को साफ रखता है। साथ में आप नहाने के लिए साबुन का इस्तेमाल करते हैं इसमें भी विज्ञान का योगदान है, दिन में आप ना जाने ऐसे कौन-कौन से और क्या-क्या सामान को यूज करते होंगे, जो हमारे डेली रूटीनDaily Routine प्रोग्राम में विज्ञान के द्वारा विकसित किए गए सामानों का उपयोग करते हैं।

निष्कर्ष

ऊपर दिए गए आर्टिकल के माध्यम से आपने Happy Festival वेबसाइट के द्वारा Dinacharya In Hindi की महत्त्वपूर्ण जानकारी पढ़ी। आशा है आपको यह जानकारी जरूर अच्छी लगी होगी, आपका समय मंगलमय हो हमारे और अधिक महत्त्वपूर्ण आर्टिकल पढ़ें।

READ: वेदों का रचनाकाल कब क्या कैसे हुआ? Ved In Hindi

वेदों का रचनाकाल कब क्या कैसे हुआ? Ved In Hindi महत्त्वपूर्ण जानकारी

हैप्पी फेस्टिवल के अंतर्गत हम इस आर्टिकल में आपके साथ Ved In Hindi की महत्त्वपूर्ण जानकारी आपके साथ सांझा करने वाले हैं। इसमें वेदों की रचनाकाल और भारतीय विचारकों की अवधारणा, गीता के विज्ञान (Hindi Geeta) के बारे में क्या कहते हैं? इस आर्टिकल में बताने वाले हैं आप इसे पूरा पढ़ें। तो चलिए जानते हैं वेदों की रचना काल के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी हैं।

Ved In Hindi महत्त्वपूर्ण जानकारी
Ved In Hindi महत्त्वपूर्ण जानकारी

वेदो का रचनाकाल (Vedo Ka Rachnakal)

राष्ट्र संघ ने दुनिया भर के विशेषज्ञों के परीक्षण के बाद ऋग्वेद को संसार की पहली लिखित पुस्तक की मान्यता दे दी है और एक हस्तलिखित प्रति जो लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पुरानी उसको संरक्षित भी कर लिया है। यदि साढ़े तीन हजार वर्ष पुरानी एक प्रति आज उपलब्ध है तो यह अनुमान सहज है कि वेदों का रचना काल इससे भी प्राचीन होगा। इसका कारण यह है कि लिपि के आविष्कार के पूर्व वेद श्रुतियों और स्मृतियों में ही सुरक्षित थे।

हजारों वर्षों तक एक वर्ग ने सुन कर याद रखा बाद में शब्द के रूप में आए। अभी पूरा संसार इस बात पर एक मत नहीं है कि वेदों (Ved) की प्राचीनता कितनी है। यदि इसी एक बात पर विचार करें कि ऋग्वेद वेदों की एक प्रति उपलब्ध है जो लगभग साढ़े तीन हजार पुरानी है तो साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व की दुनिया की तस्वीर कैसी थी इसे जानना मुश्किल नहीं है। आज रोम का, यूनान का, मिस्र का, चीन का इतिहास उपलब्ध है। सामाजिक, सांस्कृतिक और शिक्षा की जानकारी उपलब्ध है।

साढ़े तीन हजार साल पहले केवल भारत में ही विश्वविद्यालय हुआ करते थे। केवल भारत में ही पंचांग यानी कैलेंडर चला करता था। अनुसंधान और विज्ञान वहीं तो होगा, जहाँ विश्वविद्यालय होंगे और यदि भारत में विश्वविद्यालय थे तो यहीं अनुसंधान होते थे और यहीं विज्ञान का केन्द्र था।

वेदों के रचना काल की धारणाएँ (Ved Ki Rachna)

वेदों के रचना काल को लेकर तीन धारणाएँ हैं। एक धारणा वैदिक कर्मकाण्ड कर्त्ताओं की है, वेद-रचना को कम से कम 17 से 21 लाख साल पुराना मानते हैं। उनका तर्क है कि वेदों की रचना त्रेता युग से पूर्व पूर्ण हो गई थी। त्रेता यानी रामायण काल। नासा ने भारत और श्रीलंका जोड़ने वाले ‘रामसेतु’ को लगभग साढ़े सत्रह लाख साल पुराना माना है।

मान्यता है कि यह सेतु रघुनंदन राम ने अपनी श्रीलंका अभियान में बनाया था, तब वेद रचना (Ved Rachna) काल इससे पूर्व का माना गया। दूसरी धारणा है कि वेद रचना काल लगभग 10 हजार से 14 हजार वर्ष के बीच हुआ। इस धारणा का आधार यह है कि इस काल में मानवीय सभ्यता अतिविकसित थी और उसका केन्द्र भारत था। इस सभ्यता का अंत उस भयानक प्रकोप के साथ हुआ जिससे 90 प्रतिशत धरती जलमग्न हो गई।

यह आपदा इतनी भीषण थी कि धरती के कुछ हिस्से एकदम उलट गए। इसके चिह्न मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में भी मिलते हैं और द्वारिका की खुदाई में भी। वेदों के बारे में तीसरी धारणा मैक्समूलर की है। मैक्समूलर एक पादरी थे। उन्होंने संस्कृत सीखी और घोषणा की कि दुनियाभर में अध्यात्म और विज्ञान के बारे में जो लिखा गया है वह वेदों में पहले से है। उन्होंने वेदों का कालखण्ड लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व माना।

भारतीय विचारकों की धारणा Ved ke bare main

भारत के विचारक किसी विदेशी अनुसंधानकर्त्ता की धारणा को अंतिम सत्य मानते हैं। यदि हम मैक्समूलर द्वारा निर्धारित अवधि को आधार मान कर ही विचार करें तब भी आज के तमाम वैज्ञानिक अनुसंधानों का सूत्र भारत को ही जाना जायेगा। ऋग्वेद में अग्नि के आविष्कार का वर्णन है। कम से कम एक दर्जन ऋचाएँ इस अनुसंधान के बारे में हैं। वहीं ‘अरणियों’ पर बल लगा कर अग्नि उत्पन्न करने की बात है तो कमल दल से।

आविष्कारों के नाम में कुछ अंतर है। कहीं ‘भृगु’ का नाम है तो कहीं अर्थवर्ण की तो कहीं ‘भृगु अंगिरा’ का। ऋग्वेद (1: 4: 2) और (6: 16: 13) (6: 15: 17) में अग्नि को उत्पन्न करने का वर्णन है जबकि प्राचीन ग्रीक कथाओं में अग्नि को स्वर्ग से चुरा कर लाने की बात लिखी है। जो ‘देव’ स्वर्ग से अग्नि को चुरा कर लाया उसका नाम ‘प्रोमब्यूज’ है वह टिटन आयोपेटस का पुत्र था। इसका अर्थ है कि अग्नि का आविष्कार भारत में हुआ और यूरोप में अग्नि ‘चोरी’ करके ले जाई गई।

प्राचीन अरबी साहित्य और प्राचीन यूनानी साहित्य में भारत को ‘स्वर्ग’ कहा गया है। इसका आशय यह भी हो सकता है कि भारत से अग्नि यूरोप ले जाई गई। इसीलिए वहाँ अग्नि के आविष्कार की बात नहीं बल्कि अग्नि को चुरा कर ले जाने की बात लिखी है। यह घटना ईसा से 700 वर्ष पूर्व की बैठती है अर्थात् भारत अग्नि के आविष्कार के सैकड़ों साल बाद ग्रीस में अग्नि पहुँची।

वैदिक साहित्य में उल्लेख

वैदिक साहित्य में केवल अरणियों में बल लगा कर अग्नि उत्पन्न करने का उल्लेख नहीं है कि धरती और समुद्र के भीतर अग्नि होने का जिक्र है। पानी से अग्नि माँगने का उल्लेख है। इसका आशय हुआ कि धरती के नीचे ज्वालामुखी या समुद्र के ज्वालामुखी का ज्ञान वैदिक ऋषियों को हो गया था। पानी छूने में भले ठंडा लगे लेकिन उसकी तासीर गर्म होती है।

पानी से अग्नि माँगने का आशय यह भी है कि भारत में इस गुणधर्म की खोज कर ली थी। ऋग्वेद Ved में रथ के निर्माण (10: 16: 20) का वर्णन है। अनेक स्थानों पर “कीर्तिअश्र” ही आगे चलकर दुनिया में ‘हार्स पावर’ के रूप में मशहूर हुआ। भला सौ घोड़ों से जुता हुआ कोई वाहन चल सकता है? घोड़ों की जितनी लंबी कतार होगी? जैसे नियंत्रित होंगे।

इसका मतलब है कोई यंत्र, कोई मशीन, कोई कार और कोई विमान ऐसा खोजा होगा, जिसमें ‘सौ हार्स पावर’ का इंजन लगा होगा। विमान की उड़ान का परीक्षण बंधुओं से वर्षों पहले मुंबई में हो चुका था जिसके दस्तावेज मौजूद हैं। इस आधार पर ही एक फिल्म भी रिलीज हुई है।

गीता में विज्ञान (Science in Gita)

श्रीमद्भागवत गीता के 5152 वर्ष बीत चुके हैं। यह अवधि कुरुक्षेत्र की खुदाई और गुजरात में द्वारिका के शोध से मेल खाती है फिर भी मेक्समूलर ने Geeta) को 2900 वर्ष पूर्व माना है। यदि इसी को आधार बनाया जाये तब भी गीता के दसवें अध्याय में अद्भुत वैज्ञानिक निष्कर्ष हैं। ‘इसमें योगेश्वर कृष्ण ने’ ज्योतियों में सूर्य ‘और’ वृक्षों में पीपल’की श्रेष्ठता बताई। आधुनिक विज्ञान ने खोजा है कि सूर्य ही’ लाइट ” हीट ‘और’ एनर्जी’ की सोर्स है।

अर्थात् कृष्ण नक्षत्र विज्ञान के जानकार थे, विशेषज्ञ थे। इसका अर्थ है उस काल में भारत का विज्ञान इतना उन्नत था कि वे जानते थे कि प्रकाश का सर्वश्रेष्ठ केन्द्र सूर्य है। इस जानकारी के आगे आज भी विज्ञान बना हुआ। इसी अध्याय में वह कहते हैं कि’मैं वृक्षों में पीपल हूँ।’ यह वनस्पति विज्ञान का सर्वोत्कृष्ट निष्कर्ष है। केवल पीपल है जिसकी जड़ें जल का संचय करती हैं, उसके तने पर ऐसा वायरस होता है जो वायु प्रदूषण को नियंत्रित और पीपल की पत्तियाँ चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देती हैं।

इसका अर्थ है कि महाभारत काल से पहले भारतीयों को इसका ज्ञान था कि प्रकाश का सर्वश्रेष्ठ केन्द्र सूर्य है और वनस्पति में सर्वश्रेष्ठ पीपल है। यदि श्रीमद्भागवत Geeta के कालखंड को हम मैक्समूलर के अनुसार ही 2900 वर्ष पूर्व मानें तब दुनिया का नक्शा देख लें। क्या स्थिति थी रोम साम्राज्य की, क्या यूनान की, क्या लंदन या फ्रांस की और क्या स्थिति अमेरिका की थी, यूरोप में विज्ञान के आविष्कार पांच सौ साल पहले शुरू हुए। यदि किसी ने चोरी-छिपे भी काम शुरू किया तो उसे दंडित किया जाता था।

निष्कर्ष

ऊपर दिए गए आर्टिकल के अनुसार आपने वेदों के बारे में जाना है। वेदों की रचना काल के बारे में उसकी अवधारणा के बारे में पढ़ा। आशा है आप को ऊपर दी गई Ved In Hindi महत्त्वपूर्ण जानकारी अच्छी लगी होगी। आर्टिकल पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद और happy festival के आर्टिकल पढ़े।

और अधिक पढ़ें:

भारतीय जीवन में विज्ञान परंपरा । Bartiye Jeevan Me Vigyan

भारतीय जीवन (Bartiye Jeevan) शैली में विज्ञान की परंपरा समझने से पहले दो-तीन बातें जान लेना जरूरी है। सबसे पहली तो यही कि भारत में प्रत्येक शब्द उसके अर्थ और आशय के आधार पर प्रचलित। हम शब्द से ही उस विषय की परिभाषा जान सकते हैं। इसलिए भारत में भाषा भी एक विज्ञान है। यह विशेषता केवल Bharat में ही है कि जो बोला जाता है वही लिखा जाता है और जो लिखा जाता है वही बोला जाता है। ऐसी विशेषता दुनिया के किसी देश की भाषा में नहीं है।

Bartiye Jeevan Me Vigyan
Bartiye Jeevan Me Vigyan

Jeevan Me Vigyan

भारतीय भाषा (Bartiye Bhasha) संस्कृत का व्याकरण कम से कम दो हजार साल पुराना है, जबकि अन्य भाषाओं का व्याकरण बमुश्किल दो सौ साल पहले ही तैयार हुआ। इसमें अंग्रेजी भी शामिल है। संस्कृत का 108 वर्णाक्षरों का विशाल फलक है जो दुनिया में इतना वैज्ञानिक कहीं नहीं है। उस संदर्भ में यदि विज्ञान (Vigyan) शब्द के अर्थ और आशय को समझें तो किसी वस्तु, विषय, भाव या जन-जीवन के विशेष अध्ययन के आधार पर उत्पन्न ज्ञान को ही ‘विज्ञान’ कहा गया है। प्राणी की जिज्ञासा उसे विषय-वस्तु का बोध कराती है और यही आरंभिक बोध विस्तृत अध्ययन के बाद ‘विज्ञान’ का रूप लेता है।

Vigyan के अर्थ आशय को समझने के बाद हमें उस धारणा से ऊपर उठना पड़ेगा कि आज की सभ्यता विकास केवल पाँच हजार साल के भीतर है। इन्हीं पाँच हजार साल के भीतर मनुष्य आदिम युग से आधुनिक युग में आया। हो सकता है धरती-धरती के किसी हिस्से में ऐसा रहा हो, लेकिन यह पूरी दुनिया पर लागू नहीं होता। मिस्र के पिरामिड से अजंता की गुफाओं तक सैकड़ों ऐसे निर्माण हैं जिन्हें बनाना आज की आधुनिक तकनीकी और संसाधनों से भी असंभव-सा लगता है।

Bharat Me Vigyan

इन्हें आश्चर्य कहकर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। कुरूक्षेत्र, द्वारिका, कंबोडिया, लेटिन अमेरिका और इटली की पुरातात्विक खुदाई में ऐसे शिल्प और मूर्तियाँ मिली हैं जो आश्चर्यचकित करते हैं। मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में नगरों का मास्टर प्लान चौंकाने वाला है। इन सबमें तकनीकी और विज्ञान की उत्कृष्टता के दर्शन होते हैं। इसका अर्थ है कि हजारों साल पहले भी दुनिया में ऐसे लोग थे जो कि न केवल विज्ञान और तकनीकी के जानकार थे बल्कि उनका उपयोग भी करते थे।

भारत में विज्ञान (Bharat Me Vigyan) को समझने के लिए हमें उस धारणा से ऊपर उठना होगा कि आधुनिकता की नींव केवल पाँच हजार पुरानी है और भारत केवल चरवाहों, सपेरों या ऐसे कि किन्हीं खेतिहरों की धरती रही है। भारत निस्संदेह ज्ञान और विज्ञान का उद्गम स्थल है।

विज्ञान अंधविश्वास नहीं

Bharat Me Vigyan को समझने के लिए हमें किसी की आलोचना नहीं करनी, किसी धारणा का खंडन नहीं करना। लेकिन किसी धारणा से चिपकना नहीं है, उस पर अंधविश्वास नहीं करना। जो लोग धर्म, अध्यात्म अथवा विज्ञान पर अंधविश्वास करते हैं उन्हें अल्पज्ञानी कहा जाता है इसीलिए विज्ञान का सिद्धांत है कि सदैव अनुसंधान करना और आगे बढ़ना। प्रत्येक नई खोज पुरानी खोज की दुनियाभर पर ही आगे बढ़ती है, लेकिन उसे अप्रासंगिक भी करती है।

इसका अर्थ न तो पुरानी खोज अवैज्ञानिक थी और न पुरानी से चिपक कर नई खोज का तिरस्कार ही करना चाहिए। पुराना अनुसंधान ही नए अनुसंधान का आधार बनता है। इसीलिए नवीनता को स्वीकार करना ही विज्ञान का उद्घोष है। इसी बात को वैदिक ऋषि ने नेति-नेति कहा। अर्थात् अंत नहीं।

अर्थात् जो हम देख रहे हैं, सुन रहे हैं अनुभव कर रहे हैं वह अंतिम नहीं है। शब्दों और कहने के तरीके में अंतर भले हो लेकिन इन दोनों मन्तव्यों का संदेश एक है ‘अंतिम नहीं’ और दूसरा ‘ नवीनता को स्वीकार करो—इसका अर्थ हुआ कि आधुनिक विज्ञान जिसका संदेश दे रहा है उसका उद्घोष वेदों में मौजूद है। यदि विज्ञान, किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं रुकता तो वेद ने भी कहा अंतिम

विकास का क्रम है Vigyan

ऐसा नहीं है कि आज की पीढ़ी ने या आधुनिक जीवन ने ही विज्ञान से साक्षात्कार किया है। जिज्ञासा विज्ञान की और आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। जब मनुष्य ने पत्थरों को रगड़ कर आग उत्पन्न करना सीखा तो यह उस समय का विज्ञान (Vigyan) था। मिट्टी का दिया ना कर प्रकाश उत्पन्न करना सीखा तो यह उस समय का विज्ञान था। विचार करके देखिए मिट्टी का दिया बनाना, कपास से बाती बनाना, मूँगफली या सरसों से तेल निकाल कर दिए में डालना फिर दिया सलाई से प्रकाश उत्पन्न करना।

जब पहली बार इस प्रकार दिए से प्रकाश उत्पन्न किया होगा तब तत्कालीन समाज उसी प्रकार चमत्कृत रह गया होगा जैसे पहली बार बल्ब या ट्यूबलाइट को देख कर हुआ था। ठीक उसी प्रकार लकड़ी के या लोहे के पहिए नुमा चक्र बना कर वाहन तैयार किया होगा और उसे पशुओं की सहायता से चलाना प्रारंभ किया होगा तो सब यह ठीक उसी प्रकार का आविष्कार रहा था जैसा पहली बार कार देख कर हुआ। यदि वह वाहन या बैलगाड़ी न बनती तो इंसान कार कभी नहीं बना सकता था।

हमें यह बात समझ लेना चाहिए कि विकास का क्रम ही Vigyan है। अब सवाल उठता है कि अग्नि का आविष्कार कहाँ हुआ। इसका निर्विवाद उत्तर है भारत में। दुनिया की सबसे प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद मानी गई है। ऋग्वेद में चक्र के आविष्कार की, अग्नि के आविष्कार की और ‘कीर्तिअ’ यानी हार्सपावर का जिक्र है तो स्वयं प्रमाणित है कि दुनिया में विज्ञान (Duniya me vigyan) का शुभारंभ भारत में हुआ।

Read: मानव विकास का आधार। मूल्य चिन्तन। Manav Vikas ka Aadhar